सुधा मिश्रा ।

“उगह उगह हो सुरुजदेव भेल अर्घके बेर
हे पुजन केर बेर”
चैती छठिमे छठिके गीत संगीत सँ सुहावन बनल वातावरण अहि बेर उदास गुपचुप मौन रहल।सायद अहिबेरक छठिमे एना देखल गेल कोरोना वायरसके चलते। छठि एक प्रक्रिती सँ जुडल पावनि छै। अहि पावनिमे सुरुजदेवके जलमे पैस अराधल जाति छै।

ताय छठिमे समाजिक तौर सँ पोखरि ,नदी,तलाउ सब जलाशयके साफसुथर कायल जाति छै।पोखरिके भीरके निपपोत कायल जाइत छै जत छठि मैयाके अर्घ राखल
जाति छै।एतबे नहि घर सँ जलाशय तकि पहुँचवाला बाट सेहो बहारसोहार कायल जाइत छै।छठि मैयाके स्वागतमे जलाशय सबके नव कनियाजाक श्रृङ्गारल जातिछलै।

कहैत छै सीताराम सीताराम सीताराम करिहे जाहि विधि राखेराम ताहि विधि रहिहे। सायद विधिके इयाह मंजुर छलैन । आदमी अपन संस्कृति रितिरिवाज कोनाक छोडिदेतै? इ त पुर्वजके धरोहर छै।अकरा त हरहालमे निरन्तरता देबाक छै।ताहुमे हिन्दुक संस्कृति , मिथिलाक पावनि, मधेसक रिवाज अपनामे अनम‍ोल छैक। अकर पार के पायत? हर दृश्टिकोण सँ अमुल्य छै। वैज्ञानिकता सँ भरपुर छै। ताय त कोरोना वायरस सँ त्राहिमाम मचल विश्वके कोना कोनामे प्राण बचबलाय अहि वायरस मुदैया सँ बचलाय अपनही सभहक चालितलन आ परम्परा दबाइ बनिक आयल छ‌ै।चारुभर अहि दुनियाके जागरुक बनायल जारहल छै जे दुनु हाथ जोरिक प्रणाम करी।बाहर सँ आबि त हाथ पैर धोली। भान्सघरमे हब्द ओहिना नहि पैसि।हाथक अाँगुर मुँहमे धअ अइठ नहि करी।जीवनक सत्य मृत्यु संस्कार अागि लगाक करी।जे चिज मिथिला मधेसक सदान्ति सँ संस्कार , रिवाज आ चलन रहि अायल छै से महामारी कोरोना सँ बाँचक उपाय।
गर्व भय रहल अछि जे मिथिला मधेसक छी।महान् अछि अतक रहनसहन।महान् अतक बानि व्यवहार ।केहन विडम्बना खेलक चीन हाथ धोरहल पूरा विश्व ।कतेक पीडा छठि सन पावनि सँग नहि मनायल गेल।अपन अपना सँ दुर अछि।भेटघाट सँ वंचित।धनीक मनिक त खैर ठिके।विकटके घरी छै दैनिक कमाक जीववाला मजदुरके। सहरमे भाडामे रहबाला भाडादार के। सडके पर जीवन बितबवाला अो मानवके।
मनुष्यके पास धैर्यके सागर छै।अो हरहाल हर परिस्थितिमे अपनाके सम्हारि लैत छै।ताय त सम्पूर्ण मिथिला मधेसबासी एहनो असहज समयमे छठि मैयाके पुजा निष्ठा ,आस्था र भक्तिके साथ केलैथ। कहैत छै मानु त देव नहि त पाँथर।मन चंगा त कठौतीमे गंगा।सभगोटे अपने अपने घरमे पावनि भक्तिमे डुबि मनेलन्हि।
राति छै त दिन हेबे करतै।सांझ छै त भोररबा एबे करतै।अस्त भेल सुरुज उग्बे करथिन।जन्मलैय त मरबेकरतै एकदिन।इ ध्रुव सत्य छै।विधिके विधान छै।अकरा केउ नहि टालि सकैय। ताय संयम आ धैर्यता सँग सभकेउ रही।घरमे रही सुरक्षित रही।सुहनगर भोर हेबे करतै।मेला फेरो लगतै सँगै सभकेउ फेर घुम्बै करबै।जिलेबी मुरही खेबेकरतै ।

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